May 16, 2010

आतंकी जो थे ही नहीं

Posted in Human Rights, Minorities at 7:50 am by zarb

image दिलावर खान, मौलाना, इमदाद-उल-उलूम मदरसा

आतंकवाद रोकने के लिए गठित दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने चार लोगों को मार्च, 2005 में एक मुठभेड़ के बाद दक्षिण-पश्चिम दिल्ली से गिरफ्तार किया. पुलिस ने दावा किया कि उसने देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर एक बड़े आतंकी हमले को टाल दिया है. लेकिन चार साल बाद चारों को अदालत ने निर्दोष मान कर बरी कर दिया.

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल का गठन 1986 में आतंकवाद निरोधी बल के तौर पर हुआ था. 90 के दशक के उत्तरार्ध में कई आतंकियों को मार गिराने और तमाम मामलों को सुलझने के दावों के चलते इसका नाम सुर्खियों में आना शुरू हुआ. लेकिन जल्दी ही इसके कुछ अधिकारियों पर अवैध धन उगाही और फर्जी एनकाउंटर करने के आरोप लगने लगे. वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण कहते हैं, ‘दुर्भाग्यवश जब भी अदालतों ने स्पेशल सेल के अधिकारियों को झूठे सबूतों के आधार पर निर्दोष लोगों को फंसाने का दोषी पाया तो उसने इन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. अगर इन्हें कठोर दंड नहीं मिलेगा तो आगे भी पुलिसवाले निर्दोष लोगों को फर्जी आतंकवादी बनाते रहेंगे.’ आंकड़े इसकी पुष्टि करते लगते हैं. पिछले चार महीनों के दौरान दिल्ली की निचली अदालतों ने स्पेशल सेल द्वारा गिरफ्तार किए गए नौ कथित आतंकवादियों को बरी कर दिया है. इनमें से चार आतंकवादियों को स्पेशल सेल ने मार्च, 2005 में एक मुठभेड़ के बाद दक्षिण-पश्चिम दिल्ली से गिरफ्तार किया था. पुलिस का दावा था कि उन्होंने देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर होने वाले एक बड़े आतंकी हमले को टाला था. चार साल बाद ये चारों लोग बरी हो गए. इन्हीं चार लोगों की कहानी बयान कर रहे हैं बृजेश पांडे

‘भरोसा ही नहीं हुआ कि आतंकी का ठप्पा हट गया’

दिलावर खान, मौलाना, इमदाद-उल-उलूम मदरसा और मसूद अहमद, बागवाली मस्जिद के इमाम

किसी पुलिसवाले को अपनी तरफ आता देखकर ही मौलाना दिलावर खान और इमाम मसूद अहमद की रूह में कंपकपी दौड़ जाती है. दिल्ली में इमदाद उल उलूम मदरसे में मौलाना दिलावर और पास ही स्थित बागवाली मस्जिद के इमाम मसूद को मार्च, 2005 में स्थानीय पुलिस स्टेशन से बुलावा आया था. वहां उन्हें लोधी कॉलोनी स्थित दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में एक रुटीन पूछताछ के लिए जाने को कहा गया. इसके बाद लोगों को वे पांच साल बाद ही दिखाई दिए.

दिलावर और मसूद को लश्कर-ए-तैयबा का आतंकवादी करार देते हुए उनपर देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर हमले की साजिश रचने का आरोप लगाया गया. इसके बाद दोनों को पांच साल तक जेल में सड़ना पड़ा. पिछले महीने पटियाला हाउस कोर्ट ने दोनों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. अदालत ने स्पेशल सेल की यह कहते हुए खिंचाई भी की कि उसकी जांच में तमाम झोल हैं और उसने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया.

दिलावर और मसूद की गिरफ्तारी महज एक व्यक्ति के बयान के आधार पर हुई थी. हामिद हुसैन नाम का वह व्यक्ति कथित रूप से लश्कर का सदस्य था जिसने दावा किया था कि विस्फोटकों की एक खेप दिलावर के पास पड़ी हुई है. हामिद ने मसूद और दिलावर की पहचान की और पुलिस ने दावा किया कि उसने उनके पास से एक ग्रेनेड, एक चीनी पिस्तौल और 24 गोलियां बरामद कीं.

दिलावर स्पेशल सेल द्वारा की गई पूछताछ को याद करते हुए कहते हैं, ‘मैं इतना हैरान था कि मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था..वे मुझसे सिर्फ यही पूछते कि क्या मैं हामिद को जानता हूं. मैंने कहा नहीं तो वे मुझे टॉर्चर करते हुए फिर वही सवाल करने लगे. मैं इनकार करता रहा. उन्होंने कहा कि वे मुझे ऐसा सबक सिखाएंगे जो मैं कभी भूल नहीं सकूंगा. उन्होंने मुझे एक सादे पेपर पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया.’  मसूद की कहानी भी ऐसी ही है. वे बताते हैं, ‘पहले मुझसे हामिद की पहचान करने के लिए कहा गया और फिर उन्होंने साजिश का खुलासा करने को कहा. मुझे समझ में ही नहीं आया कि क्या जवाब दूं.’

स्थितियां बदतर होती गईं. ‘कैमरे के सामने जानवरों की तरह हमारी परेड कराई गई. स्पेशल सेल के अधिकारी आपस में धक्का-मुक्की कर रहे थे ताकि ‘आतंकवादियों’ के साथ प्रमुखता से उनकी भी फोटो छपे. उन्होंने मुझसे भी फोटो खिंचवाने के लिए कहा,’ दिलावर बताते हैं. ‘ऊपरवाले में मेरे यकीन का इम्तहान हो रहा था. मैंने ऐसा क्या किया जो मेरे साथ यह हुआ?’

गिरफ्तारी के बाद नजदीकी रिश्तेदारों और दोस्तों ने उनसे किनारा कर लिया. अकेले पड़ गए दिलावर और मसूद धैर्यपूर्वक अपने मामले की सुनवाई का इंतजार करने लगे. फैसला आने में लंबा वक्त लग गया. लेकिन इस साल 8 जनवरी को आए फैसले ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया. स्पेशल सेल का मामला अदालत में धराशायी हो गया. एडिशनल सेशन जज धर्मेश शर्मा ने कहा, ‘अभियोग पक्ष ने जो सबूत पेश किए हैं उनपर विश्वास नहीं होता.’ उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि इसका कोई सबूत नहीं है कि पुलिस ने दिलावर को उसके घर से गिरफ्तार किया था. मामले की खामियां उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि वेलकम स्थित दिलावर और मसूद के घरों पर छापे मारने वाली स्पेशल सेल के अधिकारी रमेश लांबा ने दिलावर खान के घर से हथियारों की बरामदगी के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा था. जस्टिस शर्मा ने इंस्पेक्टर रण सिंह के बयान पर हैरानी जाहिर की जिसके मुताबिक दिलावर को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस अपने दफ्तर लौट गई थी और उसके आधे घंटे बाद लगभग उसी जगह मसूद को गिरफ्तार करने पहुंच गई थी. जज के शब्द थे, ‘यह उन बयानों से मेल नहीं खाता जो स्पेशल सेल के अधिकारियों ने दिए हैं. इसपर यकीन करना मुश्किल है कि पुलिस पार्टी दोनों को गिरफ्तार करने के लिए एक ही इलाके में दो बार गई और एक में उन्होंने रण सिंह को शामिल किया और दूसरे में नहीं.’ पुलिस की भूमिका पर उंगली उठाते हुए जज ने आगे लिखा, ‘इस बात में भी शक है कि हामिद हुसैन से किसी तरह की पहचान करवाई गई होगी. पुलिस की रोजाना डायरी में कहीं भी उसके नाम का जिक्र नहीं था.’

मौलाना और इमाम के लिए जिंदगी का चक्का पूरा एक चक्कर घूम चुका है. उनके लिए रिहाई एक नई जिंदगी की तरह है. दिलावर कहते हैं, ‘जेल से बाहर आकर मुझे लगा जसे मैं किसी अजनबी दुनिया में आ गया हूं. काफी देर तक तो भरोसा ही नहीं हुआ कि मुझपर लगा आतंकवादी का ठप्पा हट गया है.’ मसूद सिर्फ मुस्करा कर ईश्वर को धन्यवाद देते हैं.

हालांकि उनकी खुशी जल्दी ही काफूर हो गई थी. अगले ही दिन पुलिस उनके घर आई और उनसे कहा कि वे स्थानीय पुलिस स्टेशन में पेश हों. दिलावर कहते हैं, ‘मैं आपको बता नहीं सकता कि मैं कितना डर गया था. एक ही पल में पिछले पांच सालों की त्रासदी मेरे आगे घूम गई.’ दिलावर के वकील ने उन्हें बेवजह परेशान किए जाने के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की है. वे उदास स्वर में कहते हैं, ‘क्लीन चिट मिल जाने के बावजूद मुझे फिर से गिरफ्तार होने का डर लगा रहता है. लगता है यह डर अब मेरी मौत के साथ ही जाएगा.’

‘कानून के गलत इस्तेमाल से बरबाद हुआ कैरियर’ हारून राशिद, मैकेनिकल इंजीनियर

 हारून राशिद को क्या पता था कि बेहतर रोजगार के लिए सिंगापुर जाना उन्हें इतना भारी पड़ जाएगा. बिहार के इस मैकेनिकल इंजीनियर ने दिसंबर, 2004 में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की अपनी नौकरी छोड़कर सिंगापुर की एक कंपनी ज्वॉइन की थी. 16 मई, 2005 को जब हारून भारत लौटे तो इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उन्हें स्पेशल सेल ने गिरफ्तार कर लिया. उनपर देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर आत्मघाती हमले की साजिश के लिए पैसे की व्यवस्था करने का आरोप लगा.

स्पेशल सेल का दावा था कि हारून ने 10 और 15 जनवरी को सिंगापुर से वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के जरिए 49,000 रुपए अपने भाई मोहम्मद यूनिस को भेजे थे जिसने इस रकम को शम्स के हवाले कर दिया. शम्स वही शख्स था जो मार्च, 2005 में दिल्ली के उत्तम नगर में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया था. कथित तौर पर हारून ने स्वीकार किया था कि उसने यह पैसा अपने पाकिस्तानी आका अब्दुल अजीज से हासिल किया था. पुलिस का यह भी दावा था कि उसने हारून से 76 पन्ने की ई-मेलें हासिल की हैं जो फारूक के फर्जी नाम से लिखी गई हैं. इन मेलों में उसने दूसरे आतंकियों को कूट भाषा में आगामी हमलों का निर्देश दिया था. हारून की गिरफ्तारी को पुलिस ने बहुत बड़ी सफलता बताया था.

लेकिन जब मामला सुनवाई के लिए कोर्ट में पहुंचा तो एक अलग ही तस्वीर सामने आई जिसका सार यह था कि आतंकवाद से निपटने के लिए बनाई गई स्पेशल सेल ने अपने विशेष अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया. हारून के वकील एमएस खान बताते हैं, ‘वह बहुत गरीब परिवार से है, इसलिए सिंगापुर जाने के लिए उसने अपने चाचा से एक लाख रुपए उधार लिए थे. वहां पहुंचने पर उसे लगा कि उसे इतने पैसों की जरूरत नहीं है लिहाजा उसने 49 हजार रुपए अपने भाई को वापस भेज दिए ताकि कुछ उधारी चुकाई जा सके. उसे क्या पता था कि वापस भेजी गई इसी रकम के लिए उसे लश्कर का फाइनेंसर करार दे दिया जाएगा?’

हालांकि कोर्ट में मामला औंधे मुंह गिर पड़ा. यूनिस ने मृत आतंकी शम्स को किसी तरह का पैसा देने से इनकार किया. पुलिस हारून के लश्कर से संबंधों के पक्ष में कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पाई. जिन ई-मेलों को हासिल करने का दावा किया गया था वे भी जांच-पड़ताल में गलत साबित हुईं. एसएम खान कहते हैं, ‘इंसपेक्टर कैलाश ने कोर्ट में कहा कि उन्होंने 18 मई, 2005 को उस ई-मेल का पासवर्ड पता लगा लिया था जिसका इस्तेमाल हारून अपने पाकिस्तानी आकाओं से संपर्क करने के लिए करता था और उसी दिन उन्होंने इसका प्रिंट भी निकलवाया था. लेकिन स्पेशल सेल के ही इंस्पेक्टर बद्रीश दत्त ने माना कि 13 मई, 2005 को (कैलाश की कथित सफलता के पांच दिन पहले) हारून ने खुद ही अपने ई-मेल पते का पासवर्ड बता दिया था. बद्रीश ने यह भी माना था कि उस पूछताछ के दौरान कैलाश भी वहां मौजूद थे. इससे साफ पता चलता है कि पुलिस ने इन पांच दिनों के दौरान ई-मेल के रिकॉर्डों से छेड़छाड़ की.’ अदालत ने पुलिस अधिकारी कैलाश की चुप्पी और अदालत में बोले गए झूठ पर नाराजगी जताई. 76 पन्नों का ई-मेल प्रिंट न तो कोर्ट में पेश किया गया और न ही चार्जशीट के साथ लगाया गया. पुलिस डायरी में भी इसका कोई जिक्र नहीं था. हारून को अदालत ने तो बरी कर दिया है मगर उनके वकील के मुताबिक वे अब भी डरते हैं कि कहीं उन्हें फिर से न उठा लिया जाए.

‘मेरी जवानी कौन लौटाएगा सर?’  इफ्तिखार मलिक, पूर्व बायोटेक्नोलॉजी छात्र

देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर आत्मघाती हमले की साजिश रचने और लश्कर-ए-तैयबा का आतंकवादी होने के आरोप में पांच साल जेल में बिता चुके मोहम्मद इफ्तिखार अहसान मलिक के लिए हालात अब बेहतर दिख रहे हैं. 26 वर्षीय इफ्तिखार देहरादून स्थित डॉल्फिन इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल एंड नेचुरल साइंस में बायोटेक्नोलॉजी द्वितीय वर्ष के छात्र थे. 7 मार्च, 2005 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उन्हें देहरादून से गिरफ्तार कर लिया. प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस ने दावा किया कि उसे मलिक के पास से एक डायरी मिली थी जिसमें कुरान की भड़काऊ आयतें लिखी हुई थीं. पुलिस का यह भी कहना था कि इफ्तिखार के पास एक पर्ची  भी मिली थी जिसमें गुजरात दंगों का बदला लेने की बात थी और उनसे आईएमए की एक परेड का पास भी बरामद हुआ. पुलिस के मुताबिक इफ्तिखार पाकिस्तानी आतंकवादी शम्स के संपर्क में थे जिसने उन्हें बिहार में सिमी की बैठकों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया था. यह भी कहा गया कि शम्स की डायरी में इफ्तिखार को ‘शाहिद’ नाम दिया गया था और लश्कर उसकी पढ़ाई का खर्च उठाता था.

इफ्तिखार खुद के निर्दोष होने की दलीलें देते रहे पर कोई फायदा नहीं हुआ. मामला एडिशनल सेशन जज धर्मेश शर्मा के पास पहुंचा जिन्होंने स्पेशल सेल की जांच में तमाम खामियों को उजागर करते हुए इफ्तिखार को सभी आरोपों से बरी कर दिया. जस्टिस शर्मा ने इसपर बेहद हैरानी जताई कि स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर रमेश शर्मा ने कोर्ट को बताया कि इंस्पेक्टर कैलाश सिंघल बिष्ट (जिन्होंने जब्त सामानों की सूची तैयार की थी) देहरादून गए थे और उन्होंने ही इफ्तिखार से आईएमए का पास जब्त किया था. जबकि क्रॉस एक्जामिनेशन में बिष्ट ने कहा कि वे देहरादून गए ही नहीं थे. यह पूछने पर कि फिर उन्हें पास कहां से मिला और उसे जब्त सामान की सूची में क्यों शामिल किया गया तो उनके पास कोई जवाब नहीं था. इफ्तिखार ने अदालत को बताया कि गुजरात का बदला लेने वाली पर्ची उनसे जबर्दस्ती लिखवाई गई थी. उन्होंने यह माना कि कुरान की आयतें उन्होंने ही लिखी थीं मगर साथ ही यह भी कहा कि वे भड़काऊ नहीं थीं. जस्टिस शर्मा ने इसपर भी हैरानी जाहिर की कि गिरफ्तारी और जब्त सामान की सूची बनाते वक्त पुलिस ने इफ्तिखार के मकान मालिक राम गुल्यानी से संपर्क तक नहीं किया और न ही किसी और को गवाह बनाया.  क्रॉस एक्जामिनेशन करने पर पता चला कि पुलिस अधिकारी संजय दत्त और बद्रीश दत्त- जिन्होंने कथित तौर पर इफ्तिखार का सामान जब्त किया था- कभी भी देहरादून नहीं गए. इफ्तिखार द्वारा लिखी गई कथित पर्ची पर स्पेशल सेल के अधिकारियों के बयान तो और भी विरोधाभासी थे. एक अधिकारी ने बताया कि पर्ची हिंदी में थी जबकि दूसरे का कहना था कि यह अंग्रेजी में थी.

कोर्ट ने कहा कि इफ्तिखार के लश्कर से संबंध होने का कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं है और न ही इसका प्रमाण है कि वह मार्च, 2005 में उत्तम नगर में मारे गए किसी आतंकवादी को जानता था. दूसरे आरोपितों के बयानों में एक बार भी कहीं इफ्तिखार का जिक्र नहीं आया था. सिर्फ आईएमए का पास रखने भर से किसी मकसद का पता नहीं चलता. इसके अलावा पास भी पांच महीने पुराना था और परेड पहले ही संपन्न हो चुकी थी. इफ्तिखार का मुश्किल दौर आखिरकार खत्म हो चुका है. उनकी बहन की शादी होने वाली है और उन्हें लगता है कि 2010 उनके लिए अच्छा बीतेगा.

हालांकि पुलिस का डर उन्हें अब भी हर वक्त सताता है.

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